फर्जी FIR से कैसे बचा जाता है। -”फर्जी FIR से बचने के लिए क्या क्या कानून है”

Telegram Group Join Now

इस ब्लॉग पोस्ट में हमने फर्जी FIR से बचने के लिए क्या क्या कानून है” फर्जी FIR से कैसे बचा जाता है। आपके ऊपर किसी ने फर्जी FIR लिख दिया तब क्या करे| विभिन्न तरीकों के बारे में बताया है जिनसे आप अपने विरुद्ध हुए अपराध की रिपोर्ट कैसे दर्ज करवा सकते हैं। यह ब्लॉग आपकी जानकारी और जागरूकता को बढ़ाने में मदद करेगा।

फर्जी FIR से कैसे बचा जाता है।?

हम आपको बता दें कि फर्जी FIR से कैसे बचा जाता है। देखिए यह एफआईआर को लेकर चार कंडीशन बनते हैं।

  1. पहला कि पुलिस स्टेशन में आपका FIR ही कोई ना लिखे।
  2. दूसरा कि आप ही के नाम पर कोई फर्जी एफआईआर लिख दे।
  3. अगर फर्जी एफआईआर लिख दिया तो आपकी अगर नौकरी लगने वाली है तो उसके क्या असर पड़ेगा।
  4. आप ऑलरेडी नौकरी कर रहे हैं किसी सरकारी नौकरी में और आपको इधर किसी केस में नाम डाल दिया तो उसमें क्या होगा? आईये इन सब को अच्छे से समझते है|

तो इन चारों कंडीशन को समझिए। सबसे पहले समझते हैं कि पुलिस एफआईआर नहीं लिखती है तो क्या होता है। दो तरह के केस बनते हैं जिसको पहले समझते है।

1- नॉन कॉग्निजेबल– नॉन कॉग्निजेबल मतलब ऐसे अपराध जो बहुत छोटे मोटे हैं। जैसे आपने किसी को दो तमाचा मार दिए। सब छोटा मोटा अपराध में आता है|

2- कॉग्निजेबल या संज्ञेय अपराध – एक कॉग्निजेबल होता है। संज्ञेय अपराध जिसमें मारपीट, रेप, सर फाड़ दिए, हड्डी तोड़ दी है, गोली चला दी है। ये सब होता है। कॉग्निजेबल ऑफेंस (cognizable offence) तो कॉग्निजेबल ऑफेंस जो होता है उसमें संज्ञेय अपराध में नियम है कि सीआरपीसी का जो सेक्शन है 154 यह कहता है कि पुलिस को मेंडेटरी है। एफआईआर लिखना जरूरी है।

लेकिन आप जानते हैं आपके साथ मारपीट हुआ और किसी ने सर फोड़ दिया। फिर भी पुलिस आपका एफआईआर नहीं लिखती है तो इसके लिए आप एक और रास्ता अपना सकते हैं कि पुलिस का जो सीनियर अफसर होता है, जिसे डीएसपी बोलते हैं डिप्टी सुपरिटेंडेंट। यहां आप जाकर कह सकते हैं कि सर ऐसा मामला है, आप रिपोर्ट लिखवा दीजिए। यह नहीं सुनते हैं तो आप एसपी को बोल सकते हैं। एसपी जरूर ही सुन लेते हैं। अगर ये भी नहीं सुनते है| तो आप इस आर्टिकल को जरुर पढ़े | 👉 पुलिस वाला आपकी रिपोर्ट लिखने से मना कर दे, तो आपको क्या करना चाहिए|

संगीन अपराध में होता क्या है कि गांव में मारपीट हो गया। कहीं किसी का सर फूट गया, हाथ टूट गया। अब वह क्या करता है? 10 – 20 आदमी के नाम डाल देता है। उसमें नाम डाल दिया। तो भाई उसके साथ जो अपराध हुआ है वह संज्ञेय अपराध है। उसमें आपकी गिरफ्तारी होगी। बिना आपको वारंट दिखाएं। छोटे मोटे अपराध नॉन कॉग्निजेबल में आप पुलिस से मांग सकते हैं वारंट, लेकिन कॉग्निजेबल में पुलिस वारंट नहीं देखेगी सीधे आपको उठा कर ले जाएगी। एफआईआर आपके उप्पर हो गया गया, लेकिन आप नहीं थे। आपकी दुश्मनी थी या फिर जलता था तो आपका नाम दे दिया।

उसमें तो वह फर्जी FIR है। तो अब आपको पुलिस खोजने लगेगी। उठा ले जाएगी तो आपको गिरफ्तारी का खतरा हो गया है। तो इसके लिए क्या करना चाहिए|

  • आप अपने किसी संबंधी या पिताजी या किसी को भी आप डीएसपी ऑफिस या फिर एसपी ऑफिस में ले जाइए। वहां दस्तावेज दीजिए। प्रूफ दीजिए। जिस समय घटना हुई थी, वह इस समय नहीं थे। आप अगर नहीं इन्वॉल्व थे तो कोई न कोई तो प्रूफ होगा आपके पास कि उस समय हम यहां थे। आप ले जाकर कह सकते हैं। एसपी बहुत अच्छा से सुनते हैं तो यह आपकी बात को सुन सकते हैं। और इन लोग के पास  ऑर्डर होता है कि अरेस्टिंग का आदेश जारी कर सकते हैं। या अभी इन्हें अरेस्ट नहीं किया जाए।
  • लेकिन अगर मान लिया कि ये लोग भी,अगर आपकी बात नहीं सुन रहे हैं तब क्या कीजिएगा।
  • तब आप चले जाइए एंटी सेपरेटर बेल लेने के लिए। आप अगर गिरफ्तार नहीं हुए हैं तो आप वकील को ले जाईये तुंरत अपने डिस्ट्रिक कोर्ट में एंट्री सेक्रेटरी बेल जिसे कहते हैं अग्रिम जमानत ले लीजिए।

एंटी सेपरेटर बेल आपके पास रहना चाहिए। लेकिन क्या होगा कि आप एंट्री सेपरेटर बेल भी नहीं लिए हैं। आप पुलिस, डीएसपी, एसपी भी आपकी बात नहीं सुनेगा| आप कहीं घूम रहे हैं। तो आपको पुलिस पकड़ कर डाल देगी जेल में जब जेल में डाल देगी। उसको उसके लिए भी आपको बेल लेना पड़ेगा। आप उसके लिए भी बेल ले सकते हैं। उसे कहते हैं रेगुलर बेल। यह थोड़ा लंबा प्रोसेस होता है। एंटी से पेट्री आसान होता है। तुरत मिल जाता है।

  • जज साहब हमको थोड़ा समय दे दीजिए हम आपको अपनी बेगुनाही का सबूत आपके पास लाएंगे तो आपको बेल आराम से मिल जाता है। इस बेल का मतलब है की गिरफ्तार मत कीजिएगा। कोर्ट आदेश दे देती है। अब आपको साबित करना पड़ेगा कि नहीं यह फर्जी एफआईआर है|

  • झूठी FIR या फर्जी FIR से बचने के लिए दो रास्ते है|की आप दोनों के बीच में कंप्रोमाइज कर लीजिए। देख भाई, हमको काहे लिए फंसा रहा है उल्टा सीधा। हम नहीं थे। बाद में उसे भी एहसास होता है कि यह व्यक्ति नहीं था तो कंप्रोमाइज कर लेते हैं तो यहीं पर खत्म हो जाता है।
  • लेकिन कंप्रोमाइज नहीं करेगा ना। तब आप जाइएगा। सीआरपीसी की धारा 482। इसके तहत आप हाई कोर्ट जाइए। हाईकोर्ट जाना पड़ता है 483 के तहत और हाईकोर्ट में आप अपने लीगल दस्तावेज दीजिएगा कि देखिए सर यह हमको फर्जी FIR में फंसाया है। हम उस वक्त नहीं थे। आप अगर नहीं रहेंगे। तो आपके पास पक्का प्रूफ होगा। आप दिखाइए। सीसीटीवी फुटेज दिखाइए या जो चीज दिखाइए, मोबाइल ट्रेस करके दिखाइए। आपका वकील बताएगा क्या चीज चाहिए। आप उसको दिखाइए और हाईकोर्ट आपको देखेगा। तुरत हाईकोर्ट कह देगा कि भाई यह एफआईआर फर्जी है|
  • कंप्रोमाइज नहीं किया। फर्जी के बाद भी, तब वहां आप करिए 500। ऐसी सेक्शन 500 के तहत उस पर कर दीजिए। मानहानि का दावा ठोक दीजिए और 211 के तहत उसी पर मुकदमा ठोक दीजिए कि ससुरा हमको फंसाया, हमारा इज्जत खराब किया, समय बर्बाद किया। इसको भी ले जाइए। इतना समझिए कि सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं

यदि आपके खिलाफ कोई FIR दर्ज हो गई है और वह जमानती अपराध जिसमें कि आपको गिरफ्तारी का डर है तो गिरफ्तारी से पहले आप सेशन कोर्ट या हाईकोर्ट में जाकर अग्रिम जमानत के ऑर्डर ला सकते हैं और कोर्ट के सामने प्रॉमिस करना होगा कि उनकी जो भी शर्तें हैं, आप उनका पालन करेंगे। यदि आप उनकी शर्तों की पालना नहीं करते हैं तो आपकी अग्रिम जमानत रद्द हो जाएगी

👉 पुलिस वाला आपकी रिपोर्ट लिखने से मना कर दे, तो आपको क्या करना चाहिए|

सीआरपीसी की धारा 482 क्या है। इस धारा के अंतर्गत वकील के माध्यम से हाईकोर्ट में एप्लीकेशन लगाई जा सकती है। इसके साथ व्यक्ति अपनी बेगुनाही के सुबूत भी दे सकता है। यानी सीआरपीसी की धारा 482 के तहत जिस बंदे के खिलाफ एफआईआर कराई जाती है,वह इसको चैलेज करते हुए हाईकोर्ट से निष्पक्ष न्याय की मांग कर सकता है।

FAQ

FIR कितने दिनों के लिए वैध है?

15 दिन

क्या FIR वापस लिया जा सकता है?

संविधान के धारा 257 सीआरपीसी के तहत, जिस व्यक्ति ने एफआईआर या केस के रूप में शिकायत की है, उसे इसे वापस लेने का अधिकार है, परंतु इसके लिए सभी निर्दिष्ट नियमों और कानूनों का पालन करना आवश्यक है।

झूठा आरोप लगाने पर कौन सी धारा लगती है?

किसी व्यक्ति पर झूठा आरोप लगाना झूठा आरोप होता है। फॉल्स चार्ज लगाना ताकि उसके खिलाफ कोई क्रिमिनल केस चले। अगर किसी ने ऐसा किया है तो आपको बता दूं कि यह सेक्शन टू वन वन आईपीसी के तहत अपराध है। 211 आईपीसी में अपराध है। दो वर्ष के कारावास का प्रावधान है। लेकिन यदि आरोप ऐसा है जिससे कि उस व्यक्ति को जिस पर झूठा आरोप लगाया गया है उसे डेथ पनिशमेंट दिया जा सकता है या लाइफ इम्प्रूवमेंट हो सकता है या सेवन से ज्यादा की सजा हो सकती है तो ऐसे झूठे आरोप लगाने वाले व्यक्ति को भी सात साल तक के कारावास का प्रावधान है। सेवन उसका एंड्रोजन में हो सकता है। एक बात और ध्यान रखें। मामला नॉन कॉग्निजेबल है, बेलेबल है।

गलत बोलने पर कौन सी धारा लगती है?

आईपीसी की धारा 500

मारपीट के मुकदमे में कौन सी धारा लगती है?

धारा 307

कौन सी धारा में जमानत नहीं मिलती है?

गंभीर अपराधों, जैसे कि हत्या, बलात्कार, धारा 307 (हत्या) के तहत की अपराधिक कार्यवाही, कीड़े नाशक दवाओं के प्रयोग करने के अपराध, आदि को गैर जमानती अपराध माना जाता है। 

अग्रिम जमानत कौन देता है?

भारत में उच्च न्यायालयों  और सत्र न्यायालय को गिरफ्तारी की स्थिति में अग्रिम जमानत देने का आदेश देने का अधिकार है

फर्जी FIR से कैसे बचा जाता है।,और फर्जी FIR से बचने के लिए क्या क्या कानून है |उपयुक्त कदम को मैंने बताया है। यदि किसी ने आपके खिलाफ झूठी FIR दर्ज की है, तो तुरंत कानूनी सहायता प्राप्त करें और एक अनुभवी वकील की मदद से यह सुनिश्चित करें कि आपके अधिकार सुरक्षित रहें। सबूतों की सुरक्षिति को प्राथमिकता दें और मीडिया को इस मामले की सूचना देकर सार्वजनिक समर्थन प्राप्त करें। साक्षात्कार और सभी संभावित तरीकों को ध्यान में रखते हुए, आपको इस चुनौती का सामना करना चाहिए ताकि आप अपने नाम को साफ़ कर सकें। इससे जुडी कोई भी प्रश्न हो,आप हमसे पूछ सकते है, कमेंट या Contact Us का फॉर्म भर के|


अपना कीमती समय देने के लिए धनयबाद ,आपको फिर कोई प्रश्न है तो आप बिलकुल कमेंट में हमसे पूछ सकते है या हमे कांटेक्ट भी कर सकते है। और आप सभी का धन्यवाद |

नमस्कार दोस्तों, मैं सौरभ कुमार, एक Professional Blogger हूँ और इस ब्लॉग का Founder, Author हूँ. इस ब्लॉग पर मैं नियमित रूप से उपयोगी नईं-नईं जानकारी शेयर करता रहता हूँ।

Leave a Comment